रिपोर्ट: हरी शंकर शर्मा
कानपुर। हीमोफीलिया-ए से पीड़ित बच्चों के उपचार में एमिसिजुमैब (हेमलिब्रा) थेरेपी एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रही है। यह आधुनिक उपचार रक्तस्राव की घटनाओं को कम करने में मदद करता है। इसके इस्तेमाल से बच्चों को बार-बार नसों के माध्यम से फैक्टर-8 के इंजेक्शन लगवाने की परेशानी से राहत मिल सकती है। इससे बच्चों के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने और उनके परिवारों की उपचार संबंधी कठिनाइयों को कम करने में मदद मिलती है।
हीमोफीलिया सोसायटी कानपुर के नोडल डॉ. यशवंत राव ने बताया कि कानपुर में अब तक सात बच्चों को हेमलिब्रा थेरेपी दी जा चुकी है। इन बच्चों को पहले प्रत्येक सप्ताह फैक्टर-8 की आवश्यकता पड़ती थी। उन्होंने बताया कि उपचार के अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं। यह थेरेपी रक्तस्राव की घटनाओं को कम करने और बच्चों को बेहतर जीवन जीने में सहायता प्रदान कर सकती है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर के प्रधानाचार्य डॉ. संजय काला ने कहा कि हीमोफीलिया से पीड़ित बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए बीमारी की समय पर पहचान, नियमित चिकित्सकीय देखभाल और उचित उपचार बेहद जरूरी हैं। अभिभावकों को बीमारी के लक्षणों और उपलब्ध उपचार विकल्पों के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
क्या है हेमलिब्रा थेरेपी?
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अमितेश यादव ने बताया कि एमिसिजुमैब एक आधुनिक जैविक औषधि है, जिसे त्वचा के नीचे इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है। यह रक्त का थक्का बनाने की प्रक्रिया में फैक्टर-8 की भूमिका की नकल करके काम करती है। इसके उपयोग से पारंपरिक फैक्टर-8 की तरह बार-बार नसों में इंजेक्शन लगाने की आवश्यकता कम हो सकती है।
उन्होंने बताया कि शुरुआती खुराक के बाद विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह के अनुसार यह दवा प्रत्येक सप्ताह, दो सप्ताह या चार सप्ताह में एक बार दी जा सकती है। यह उन बच्चों के लिए भी उपयोगी हो सकती है, जिनके शरीर में फैक्टर-8 के विरुद्ध अवरोधक प्रतिरक्षी तत्व यानी इनहिबिटर विकसित हो जाते हैं। हालांकि, दवा की खुराक और उपचार की अवधि का निर्धारण बच्चे की स्थिति के अनुसार विशेषज्ञ चिकित्सक करते हैं।
हीमोफीलिया में जागरूकता और समय पर उपचार जरूरी
डॉ. अमितेश यादव के अनुसार, हीमोफीलिया एक आनुवंशिक रक्तस्राव संबंधी विकार है, जिसमें रक्त का थक्का सामान्य रूप से बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। हीमोफीलिया-ए में फैक्टर-8 की कमी के कारण जोड़ों, मांसपेशियों और शरीर के अन्य अंगों में रक्तस्राव हो सकता है। गंभीर मामलों में आंतरिक रक्तस्राव जानलेवा भी साबित हो सकता है।
बच्चों में हीमोफीलिया के प्रमुख लक्षण
डॉ. यशवंत राव ने बताया कि बच्चों में बिना स्पष्ट कारण बार-बार नील पड़ना, असामान्य सूजन, बार-बार रक्तस्राव या जोड़ों में दर्द जैसे लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। सिर में चोट लगने या गंभीर रक्तस्राव की स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जागरूकता, समय पर जांच और उचित उपचार से बीमारी की जटिलताओं को कम करने तथा बच्चों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने में मदद मिल सकती है।





